- इस यात्रा वृतांत से पता चलता है कि उस समय तिब्बती समाज में परदा प्रथा, छुआछूत जैसी बुराइयाँ न था। महिलाएँ अजनबी लोगों को भी चाय बनाकर दे देती थी। निम्न श्रेषी के भिखमंगों को छोड़कर कोई भी किसी के घर में आ जा सकता था। पुरुषवर्ग शाम के समय छक पीकर मदहोश रहते थे। वे गंडों पर अगाध विश्वास रखते थे। समाज में अंधविश्वास का बोलबाला था।
ल्हासा की ओर — राहुल सांकृत्यायन | विस्तृत अध्ययन
लेखक परिचय — राहुल सांकृत्यायन (1893-1963)
"महापंडित" की उपाधि। हिंदी यात्रा साहित्य के जनक। 45+ देशों की यात्रा। तिब्बत से दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियाँ लाए। प्रमुख रचनाएँ: वोल्गा से गंगा, मेरी जीवन यात्रा। बहुभाषाविद् — 36 भाषाओं के ज्ञाता।
विस्तृत यात्रा विवरण
1929-30 में राहुल जी ने नेपाल के रास्ते तिब्बत की यात्रा की। यह तीसरी तिब्बत यात्रा थी। मार्ग: नेपाल → डांगरा → तिंगरी → ल्हासा। तिब्बती साथी सुमति (बौद्ध भिक्षु) उनके साथ थे।
रास्ते की विशेषताएँ: 17,000 फीट ऊँचे दर्रे, बर्फीले तूफ़ान, डाकुओं का भय, भूखे-प्यासे चलना। तिब्बत में अनूठी सामाजिक व्यवस्था — स्त्रियाँ स्वतंत्र, बहुपति विवाह, डकैती एक व्यवसाय, बौद्ध मठों का प्रभुत्व।
आदर्श उत्तर
उत्तर: तिब्बत की सामाजिक व्यवस्था भारत से कई प्रकार से भिन्न थी। पहला, तिब्बत में स्त्रियों को पुरुषों से अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी — वे व्यापार करती थीं और घर-बाहर दोनों के निर्णय लेती थीं। दूसरा, तिब्बत में बहुपति विवाह (एक स्त्री कई पतियों की) प्रथा प्रचलित थी। तीसरा, वहाँ डकैती को एक सामान्य व्यवसाय माना जाता था — लोग बिना किसी संकोच के इसे अपना पेशा बताते थे। चौथा, जाति-पाँति का कोई बंधन नहीं था — कोई छुआछूत नहीं। पाँचवाँ, बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था — मठ और लामा समाज में सर्वोच्च स्थान रखते थे।