CBSE Class 9 Hindi Question 3 of 13

Premchand Ke Phate Joote — Question 3

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3
Question
नीचे दी गई पंक्तियों में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए- (क) जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। (ख) तुम परदे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम परदे पर कुरबान हो रहे हैं। (ग) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?
Answer

- (क) जीवन में यह विडंबना है कि जिसका स्थान पाँव में हैं, अर्थात् नीचे है, उसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता रहा है। जिसका स्थान ऊँचा है, जो सिर पर बिठाने योग्य है, उसे कम सम्मान मिलता रहा है। आजकल तो जूतों का अर्थात् धनवानों का मान-सम्मान और भी अधिक बढ़ गया है। एक धनवान पर पच्चीसों गुणी लोग न्योछावर होते हैं। गुणी लोग भी धनवानों की जी-हुजूरी करते नजर आते हैं। (ख) प्रेमचंद ने कभी पर्दे को अर्थात् लुकाव-छिपाव को महत्त्व नहीं दिया। उन्होंने वास्तविकता को कभी टॅकने का प्रयत्न नहीं किया। वे इसी में संतुष्ट थे कि उनके पास छिपाने-योग्य कुछ नहीं था। वे अंदर-बाहर से एक थे। यहाँ तक कि उनका पहनावा भी अलग-अलग न था। लेखक अपनी तथा अपने युग की मनोभावना पर व्यंग्य करता है कि हम पर्दा रखने को बड़ा गुण मानते हैं। जो व्यक्ति अपने कष्टों को छिपाकर समाज के सामने सुखी होने का ढोंग करता है, हम उसी को महान मानते हैं। जो अपने दोषों को छिपाकर स्वयं को महान सिद्ध करता है, हम उसी को श्रेष्ठ मानते हैं। (ग) लेखक कहता है-प्रेमचंद ने समाज में जिसे भी घृणा-योग्य समझा, उसकी ओर हाथ की अँगुली से नहीं, बल्कि अपने पाँव की अँगुली से इशारा किया। अर्थात् उसे अपनी ठोकरों पर रखा, अपने जूते की नोक पर रखा, उसके विरुद्ध संघर्ष किए रखा।

प्रेमचंद के फटे जूते — विस्तृत अध्ययन | Bright Tutorials
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हिंदी | क्षितिज — प्रेमचंद के फटे जूते (विस्तृत) विस्तृत अध्ययन सामग्री

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई | विस्तृत अध्ययन

लेखक परिचय — हरिशंकर परसाई (1924-1995)

हिंदी व्यंग्य साहित्य के शिखर पुरुष। प्रमुख रचनाएँ: विकलांग श्रद्धा का दौर, और अंत में, तब की बात और थी। साहित्य अकादेमी पुरस्कार। सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करने में सिद्धहस्त।

विस्तृत विश्लेषण

परसाई ने प्रेमचंद की तस्वीर में फटे जूतों को देखा। इस तस्वीर में प्रेमचंद अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ हैं। प्रेमचंद के पैरों में कैनवास के जूते हैं जिनमें से अँगूठा बाहर झाँक रहा है, लेकिन चेहरे पर मुस्कान है।

परसाई इस विरोधाभास से प्रभावित होते हैं — फटे जूते = गरीबी + मुस्कान = आत्मसम्मान। प्रेमचंद ने कभी पैसों के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वे ईमानदारी से लिखते रहे, भले ही गरीबी झेलनी पड़ी।

आदर्श उत्तर

प्रश्न: "फटे जूते" प्रेमचंद के किस गुण के प्रतीक हैं?

उत्तर: "फटे जूते" प्रेमचंद की ईमानदारी, सादगी और सिद्धांतों से समझौता न करने की प्रवृत्ति के प्रतीक हैं। परसाई कहते हैं कि जिस व्यक्ति के जूते फटे हैं, उसने या तो बहुत चला है या दुनिया से समझौता नहीं किया। प्रेमचंद ने चुना — ईमानदारी, भले ही जूते फटे। जिन लोगों ने समझौता किया, उनके जूते कभी नहीं फटे लेकिन उनकी आत्मा फटी। फटे जूते गरीबी नहीं, बल्कि नैतिक श्रेष्ठता के प्रतीक हैं।