CBSE Class 9 Hindi Question 8 of 11

Upbhoktavad Ki Sanskriti — Question 8

Back to all questions
8
Question
आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए।
Answer

- आज की उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव से हमारे रीति-रिवाज और त्योहार अछूते नहीं रहे। हमारे रीति-रिवाज और त्योहार सामाजिक समरसता बढ़ाने वाले, वर्ग भेद मिटाने वाले सभी को उल्लासित एवं आनंदित करने वाले हुआ करते थे, परंतु उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव से इनमें बदलाव आ गया है। इससे त्योहार अपने मूल उद्देश्य से भटक गए हैं। आज रक्षाबंधन के पावन अवसर पर बहन भाई द्वारा दिए गए उपहार का मूल्य आंकलित करती है। दीपावली के त्योहार पर मिट्टी के दीए प्रकाश फैलाने के अलावा समानता दर्शाते थे परंतु बिजली की लड़ियों और मिट्टी के दीयों ने अमीर-गरीब का अंतर स्पष्ट कर दिया है। यही हाल अन्य त्योहारों का भी है।

उपभोक्तावाद की संस्कृति — विस्तृत अध्ययन | Bright Tutorials
BRIGHT TUTORIALS
Bright Tutorials Logo
BRIGHT TUTORIALS
CBSE Class IX | Academic Year 2026-2027
9403781999
Excellence in Education
हिंदी | क्षितिज — उपभोक्तावाद (विस्तृत) विस्तृत अध्ययन सामग्री

उपभोक्तावाद की संस्कृति — श्यामाचरण दुबे | विस्तृत अध्ययन

लेखक परिचय

श्यामाचरण दुबे (1922-1996) — प्रसिद्ध समाजशास्त्री। भारतीय समाज के गहन अध्ययनकर्ता। प्रमुख रचनाएँ: समय और संस्कृति, भारतीय ग्राम। पद्मभूषण से सम्मानित।

निबंध का विस्तृत विश्लेषण

लेखक ने उपभोक्तावाद को एक सांस्कृतिक संकट के रूप में प्रस्तुत किया है। मुख्य तर्क:

  • विज्ञापन संस्कृति: विज्ञापन हमें बताते हैं कि हमें क्या चाहिए — हमारी इच्छाएँ कृत्रिम रूप से निर्मित होती हैं
  • पश्चिमी अंधानुकरण: भारतीय समाज पश्चिम की नकल कर रहा है — खान-पान, पहनावा, जीवनशैली सब बदल रहा है
  • सांस्कृतिक पहचान का संकट: हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं
  • सादगी का महत्व: गांधी जी ने कहा — "पृथ्वी हर मनुष्य की ज़रूरत पूरी कर सकती है, पर लालच नहीं"

आदर्श उत्तर

प्रश्न: उपभोक्तावाद ने भारतीय संस्कृति को कैसे प्रभावित किया है?

उत्तर: उपभोक्तावाद ने भारतीय संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है। विज्ञापनों ने हमारी इच्छाओं को ज़रूरतों में बदल दिया है। हम अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं क्योंकि विज्ञापन कहता है कि हमें उनकी आवश्यकता है। पश्चिमी जीवनशैली का अंधानुकरण बढ़ा है — त्योहारों में भी बाज़ारवाद हावी है। भारतीय सादगी, संतोष और आत्मनियंत्रण के मूल्य कमज़ोर हो रहे हैं। गांधी जी के "सादा जीवन, उच्च विचार" का आदर्श भुलाया जा रहा है।