- हमारे अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार उसकी गुणवत्ता होनी चाहिए न कि विज्ञापन। इस संबंध में कबीर की उक्ति पूर्णतया सटीक बैठती है कि-‘मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।’ विज्ञापन हमें वस्तुओं की विविधता, मूल्य, उपलब्धता आदि का ज्ञान तो कराते हैं परंतु उनकी गुणवत्ता का ज्ञान हमें अपनी बुधि-विवेक से करके ही आवश्यकतानुसार वस्तुएँ खरीदनी चाहिए।
उपभोक्तावाद की संस्कृति — श्यामाचरण दुबे | विस्तृत अध्ययन
लेखक परिचय
श्यामाचरण दुबे (1922-1996) — प्रसिद्ध समाजशास्त्री। भारतीय समाज के गहन अध्ययनकर्ता। प्रमुख रचनाएँ: समय और संस्कृति, भारतीय ग्राम। पद्मभूषण से सम्मानित।
निबंध का विस्तृत विश्लेषण
लेखक ने उपभोक्तावाद को एक सांस्कृतिक संकट के रूप में प्रस्तुत किया है। मुख्य तर्क:
- विज्ञापन संस्कृति: विज्ञापन हमें बताते हैं कि हमें क्या चाहिए — हमारी इच्छाएँ कृत्रिम रूप से निर्मित होती हैं
- पश्चिमी अंधानुकरण: भारतीय समाज पश्चिम की नकल कर रहा है — खान-पान, पहनावा, जीवनशैली सब बदल रहा है
- सांस्कृतिक पहचान का संकट: हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं
- सादगी का महत्व: गांधी जी ने कहा — "पृथ्वी हर मनुष्य की ज़रूरत पूरी कर सकती है, पर लालच नहीं"
आदर्श उत्तर
उत्तर: उपभोक्तावाद ने भारतीय संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है। विज्ञापनों ने हमारी इच्छाओं को ज़रूरतों में बदल दिया है। हम अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं क्योंकि विज्ञापन कहता है कि हमें उनकी आवश्यकता है। पश्चिमी जीवनशैली का अंधानुकरण बढ़ा है — त्योहारों में भी बाज़ारवाद हावी है। भारतीय सादगी, संतोष और आत्मनियंत्रण के मूल्य कमज़ोर हो रहे हैं। गांधी जी के "सादा जीवन, उच्च विचार" का आदर्श भुलाया जा रहा है।