CBSE Class 9 Hindi Question 10 of 11

Upbhoktavad Ki Sanskriti — Question 10

Back to all questions
10
Question
‘दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों का बच्चों पर बढ़ता प्रभाव’ विषय पर अध्यापक और विद्यार्थी के बीच हुए वार्तालाप को संवाद शैली में लिखिए।
Answer

- इस पाठ के माध्यम से आपने उपभोक्ता संस्कृति के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। अब आप अपने अध्यापक की सहायता से सामंती संस्कृत के बारे में जानकारी प्राप्त करें और नीचे दिए गए विषय के पक्ष अथवा विपक्ष में कक्षा में अपने विचार व्यक्त करें। क्या उपभोक्ता संस्कृति सामंती संस्कृति का ही विकसित रूप है। आप प्रतिदिन टी० वी० पर ढेरों विज्ञापन देखते-सुनते हैं और इनमें से कुछ आपकी ज़बान पर चढ़ हैं। आप अपनी पसंद की किन्हीं दो वस्तुओं पर विज्ञापन तैयार कीजिए। उत्तर-छात्र स्वयं करें। अन्य पाठेतर हल प्रश्न लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

उपभोक्तावाद की संस्कृति — विस्तृत अध्ययन | Bright Tutorials
BRIGHT TUTORIALS
Bright Tutorials Logo
BRIGHT TUTORIALS
CBSE Class IX | Academic Year 2026-2027
9403781999
Excellence in Education
हिंदी | क्षितिज — उपभोक्तावाद (विस्तृत) विस्तृत अध्ययन सामग्री

उपभोक्तावाद की संस्कृति — श्यामाचरण दुबे | विस्तृत अध्ययन

लेखक परिचय

श्यामाचरण दुबे (1922-1996) — प्रसिद्ध समाजशास्त्री। भारतीय समाज के गहन अध्ययनकर्ता। प्रमुख रचनाएँ: समय और संस्कृति, भारतीय ग्राम। पद्मभूषण से सम्मानित।

निबंध का विस्तृत विश्लेषण

लेखक ने उपभोक्तावाद को एक सांस्कृतिक संकट के रूप में प्रस्तुत किया है। मुख्य तर्क:

  • विज्ञापन संस्कृति: विज्ञापन हमें बताते हैं कि हमें क्या चाहिए — हमारी इच्छाएँ कृत्रिम रूप से निर्मित होती हैं
  • पश्चिमी अंधानुकरण: भारतीय समाज पश्चिम की नकल कर रहा है — खान-पान, पहनावा, जीवनशैली सब बदल रहा है
  • सांस्कृतिक पहचान का संकट: हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं
  • सादगी का महत्व: गांधी जी ने कहा — "पृथ्वी हर मनुष्य की ज़रूरत पूरी कर सकती है, पर लालच नहीं"

आदर्श उत्तर

प्रश्न: उपभोक्तावाद ने भारतीय संस्कृति को कैसे प्रभावित किया है?

उत्तर: उपभोक्तावाद ने भारतीय संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है। विज्ञापनों ने हमारी इच्छाओं को ज़रूरतों में बदल दिया है। हम अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं क्योंकि विज्ञापन कहता है कि हमें उनकी आवश्यकता है। पश्चिमी जीवनशैली का अंधानुकरण बढ़ा है — त्योहारों में भी बाज़ारवाद हावी है। भारतीय सादगी, संतोष और आत्मनियंत्रण के मूल्य कमज़ोर हो रहे हैं। गांधी जी के "सादा जीवन, उच्च विचार" का आदर्श भुलाया जा रहा है।