- (क) हमारे समाज में जाति-धर्म, भाषा, संप्रदाय आदि के नाम पर भेदभाव किया जाता है। इससे समाज और देश को बहुत हानि हो रही है। इससे समाज हिंदू-मुसलमान में बँटकर सौहार्द और भाई-चारा खो बैठा है। दोनों एक-दूसरे के शत्रु से नजर आते हैं। त्योहारों के समय इनकी कट्टरता के कारण किसी न किसी अनहोनी की आशंका बनी। रहती है। इसके अलावा समय-असमय दंगे होने का भय बना रहता है। इससे कानून व्यवस्था की समस्या उठ खड़ी होती है तथा विकास पर किया जाने वाला खर्च अकारण नष्ट होता है। (ख) आपसी भेदभाव मिटाने के लिए लोगों को सहनशील बनना होगा, सर्वधर्म समभाव की भावना लानी होगी तथा कट्टरता त्याग कर धार्मिक सौहार्द का वातावरण बनाना होगा। सभी धर्मों के अनुयायियों के साथ समानता का व्यवहार करना होगा तथा वोट की खातिर किसी धर्म विशेष का तुष्टीकरण बंद करना होगा ताकि अन्य धर्मानुयायियों को अपनी उपेक्षा न महसूस हो। पाठेतर सक्रियता
वाख — ललद्यद | विस्तृत अध्ययन
ललद्यद — कश्मीर की संत कवयित्री
14वीं शताब्दी, कश्मीर। शैव दर्शन की अनुयायी। "लल्ला" नाम से प्रसिद्ध। कश्मीरी भाषा में "वाख" (वाक् = वाणी) लिखीं। कबीर से लगभग 100 वर्ष पूर्व। आत्मज्ञान, ईश्वर खोज, और सांसारिक मोह-माया से मुक्ति का उपदेश।
आदर्श उत्तर
उत्तर: ललद्यद और कबीर दोनों ने बाहरी आडंबर का विरोध किया और आत्मज्ञान पर बल दिया। ललद्यद शैव दर्शन की अनुयायी थीं — शिव ही सर्वत्र है। कबीर निर्गुण भक्ति के — राम (निराकार ईश्वर) सबमें है। दोनों ने कहा कि मंदिर-मस्जिद में ईश्वर नहीं, अपने भीतर है। ललद्यद मध्यम मार्ग (न अधिक भोग, न अधिक त्याग) की समर्थक थीं। कबीर ने भी अतिवाद का विरोध किया। दोनों लोकभाषा में लिखकर जनसाधारण तक पहुँचे।