- वेशभूषा के प्रति लोगों की सोच में बहुत बदलाव आया है। लोग वेशभूषा को सामाजिक प्रतिष्ठा का सूचक मानने लगे हैं। लोग उस व्यक्ति को ज्यादा मान-सम्मान और आदर देने लगे हैं जिसकी वेशभूषा अच्छी होती है। वेशभूषा से ही व्यक्ति का दूसरों पर पहला पड़ता है। हमारे विचारों का प्रभाव तो बाद में पड़ता है। आज किसी अच्छी-सी पार्टी में कोई धोतीकुरता पहनकर जाए तो उसे पिछड़ा समझा जाता है। इसी प्रकार कार्यालयों के कर्मचारी गण हमारी वेशभूषा के अनुरूप व्यवहार करते हैं। यही कारण है कि लोगों विशेषकर युवाओं में आधुनिक बनने की होड़ लगी है। भाषा अध्ययन
प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई | विस्तृत अध्ययन
लेखक परिचय — हरिशंकर परसाई (1924-1995)
हिंदी व्यंग्य साहित्य के शिखर पुरुष। प्रमुख रचनाएँ: विकलांग श्रद्धा का दौर, और अंत में, तब की बात और थी। साहित्य अकादेमी पुरस्कार। सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करने में सिद्धहस्त।
विस्तृत विश्लेषण
परसाई ने प्रेमचंद की तस्वीर में फटे जूतों को देखा। इस तस्वीर में प्रेमचंद अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ हैं। प्रेमचंद के पैरों में कैनवास के जूते हैं जिनमें से अँगूठा बाहर झाँक रहा है, लेकिन चेहरे पर मुस्कान है।
परसाई इस विरोधाभास से प्रभावित होते हैं — फटे जूते = गरीबी + मुस्कान = आत्मसम्मान। प्रेमचंद ने कभी पैसों के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वे ईमानदारी से लिखते रहे, भले ही गरीबी झेलनी पड़ी।
आदर्श उत्तर
उत्तर: "फटे जूते" प्रेमचंद की ईमानदारी, सादगी और सिद्धांतों से समझौता न करने की प्रवृत्ति के प्रतीक हैं। परसाई कहते हैं कि जिस व्यक्ति के जूते फटे हैं, उसने या तो बहुत चला है या दुनिया से समझौता नहीं किया। प्रेमचंद ने चुना — ईमानदारी, भले ही जूते फटे। जिन लोगों ने समझौता किया, उनके जूते कभी नहीं फटे लेकिन उनकी आत्मा फटी। फटे जूते गरीबी नहीं, बल्कि नैतिक श्रेष्ठता के प्रतीक हैं।