CBSE Class 9 Hindi Question 7 of 13

Premchand Ke Phate Joote — Question 7

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7
Question
प्रेमचंद के फटे जूते को आधार बनाकर परसाई जी ने यह व्यंग्य लिखा है। आप भी किसी व्यक्ति की पोशाक को आधार बनाकर एक व्यंग्य लिखिए।
Answer

- मेरे हाथ में मेरे जिस मित्र का हाथ है, उसकी एक चीज़ का मैं हमेशा से कायल हूँ। वह है उसकी टाई की गाँठ। ऐसी साफ-सुथरी गाँठ आपके देखने में नहीं आई होगी। लगता है, जैसे जन्मजात ऐसी ही हो। कोई सिलवट नहीं, कोई बिखरावट नहीं। ऐसा नहीं है कि वे यह टाई सूट के साथ पहनते हों। गर्मियों में कमीज के साथ भी वे टाई पहनते हैं। तब भी टाई की गाँठ इसी तरह रहती है। सच बताऊँ! मुझे एक भी ऐसा दृश्य याद नहीं आता, जब मैंने उन्हें टाई के बिना देखा हो। हाँ, एक बार मैं सुबह-सुबह उनके घर चला गया था। उस समय भी उन्होंने मुझे 45 मिनट प्रतीक्षा कराई। जब ड्राइंग रूम में आए तो टाई लगाए हुए थे। गाँठ तब भी वैसी थी, जैसे जन्मजात हो। मैं सोचता हूँ इन्हें गाँठ लगाने का इतना शौक क्यों है? शायद इसलिए कि वे बिखराव को नहीं, गठन को पसंद करते हैं। इसलिए जब भी बोलते हैं, सँभलकर बोलते हैं। मैंने आज तक उन्हें व्यर्थ की गप्पें लड़ाते नहीं देखी। चुटकले सुनाते नहीं देखा। सुनाते क्या, चुटकलों पर हँसते भी नहीं देखा। यदि कोई उनके सामने कोई चुटकले पर हँस दे तो वे उसे ‘बेहूदा’ या ‘बेशऊर’ कहकर घंटों तक अपना मुँह बिगाड़े रहते हैं। उनका एक ही सिद्धांत है-बोलो, तो ढंग का बोलो। वरना चुप रहो। ऐसा न समझिए, कि वे अकसर चुप रहते हैं। नहीं, वे अकसर बोलते पाए जाते हैं। और जब भी बोलते हैं-किसी-न-किसी राष्ट्रीय समस्या पर चिंता प्रकट करते पाए जाते हैं। उनका व्यक्तित्व गंभीर है। यदि कोई उनकी बात न सुन रहा हो तो वे उस पर व्यंग्य कसने लगते हैं। और अगर कोई और बीच में बोलना शुरू कर दे तो उसकी ओर से मुँह मोड़कर उबासी लेने लगते हैं। मेरे टाई वाले मित्र की एक खूबी यह भी है कि वे हर किसी के गिरेबान में झाँकते हैं। उनकी एक-से-एक बेहूदी बात को बतंगड़ बनाकर पेश करते हैं। पर अपने गिरेबान में उन्होंने टाई बाँध रखी है, किसी को झाँकने नहीं देते। पिछले दिनों उन्हें कोई सदमा लगा। वे पागल हो गए। पेट ऐसे निकल आया जैसे दस बच्चे एक साथ प्रसव करेंगे। लोगों को उनके गिरेबान में न सही, बाहरी व्यक्तित्व में झाँकने का मौका मिल गया। परंतु तब वे छुट्टियाँ ले गए। तब तक वापस नहीं आए, जब तक उनकी देह वापस अपनी औकात पर न लौट आई। सच बात तो यह है कि मेरे इस मित्र के पूरे जीवन में गाँठे ही गाँठे हैं। अपने बड़े होने की गाँठ। टाई तो बस ऊपरी गाँठ है। भीतर कितनी गाँठे हैं, यह उनकी पत्नी से हमने जाना। वे भी उनसे इतना डरती हैं जितना कि चपड़ासी साहब से। इसलिए बेचारी तभी हँसती हैं, जब वे चाहते हैं।

प्रेमचंद के फटे जूते — विस्तृत अध्ययन | Bright Tutorials
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हिंदी | क्षितिज — प्रेमचंद के फटे जूते (विस्तृत) विस्तृत अध्ययन सामग्री

प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई | विस्तृत अध्ययन

लेखक परिचय — हरिशंकर परसाई (1924-1995)

हिंदी व्यंग्य साहित्य के शिखर पुरुष। प्रमुख रचनाएँ: विकलांग श्रद्धा का दौर, और अंत में, तब की बात और थी। साहित्य अकादेमी पुरस्कार। सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करने में सिद्धहस्त।

विस्तृत विश्लेषण

परसाई ने प्रेमचंद की तस्वीर में फटे जूतों को देखा। इस तस्वीर में प्रेमचंद अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ हैं। प्रेमचंद के पैरों में कैनवास के जूते हैं जिनमें से अँगूठा बाहर झाँक रहा है, लेकिन चेहरे पर मुस्कान है।

परसाई इस विरोधाभास से प्रभावित होते हैं — फटे जूते = गरीबी + मुस्कान = आत्मसम्मान। प्रेमचंद ने कभी पैसों के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वे ईमानदारी से लिखते रहे, भले ही गरीबी झेलनी पड़ी।

आदर्श उत्तर

प्रश्न: "फटे जूते" प्रेमचंद के किस गुण के प्रतीक हैं?

उत्तर: "फटे जूते" प्रेमचंद की ईमानदारी, सादगी और सिद्धांतों से समझौता न करने की प्रवृत्ति के प्रतीक हैं। परसाई कहते हैं कि जिस व्यक्ति के जूते फटे हैं, उसने या तो बहुत चला है या दुनिया से समझौता नहीं किया। प्रेमचंद ने चुना — ईमानदारी, भले ही जूते फटे। जिन लोगों ने समझौता किया, उनके जूते कभी नहीं फटे लेकिन उनकी आत्मा फटी। फटे जूते गरीबी नहीं, बल्कि नैतिक श्रेष्ठता के प्रतीक हैं।