- आज दिखावे की संस्कृति पनप रही है। यह बात बिल्कुल सत्य है। इसलिए लोग उन्हीं चीजों को अपना रहे हैं, जो दुनिया की नजरों में अच्छी हैं। सारे सौंदय-प्रसाधन मनुष्यों को सुंदर दिखाने के ही प्रयास करते हैं। पहले यह दिखावा औरतों में होता था, आजकल पुरुष भी इस दौड़ में आगे बढ़ चले हैं। नए-नए परिधान और फैशनेबल वस्त्र दिखावे की संस्कृति को ही बढ़ावा दे रहे हैं। आज लोग समय देखने के लिए घड़ी नहीं खरीदते, बल्कि अपनी हैसियत दिखाने के लिए हजारों क्या लाखों रुपए की घड़ी पहनते हैं। आज हर चीज पाँच सितारा संस्कृति की हो गई है। खाने के लिए पाँच-सितारा होटल, इलाज के लिए पाँच सितारा हस्पताल, पढ़ाई के लिए पाँच सितारा सुविधाओं वाले विद्यालये-सब जगह दिखावे का ही साम्राज्य है। यहाँ तक कि लोग मरने के बाद अपनी कब्र के लिए लाखों रुपए खर्च करने लगे हैं ताकि वे दुनिया में अपनी हैसियत के लिए पहचाने जा सकें। यह दिखावा-संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से दूर कर रही है। लोगों के सामाजिक संबंध घटने लगे हैं। मन में अशांति जन्म ले रही है। आक्रोश बढ़ रहा है, तनाव बढ़ रहा है। हम लक्ष्य से भटक रहे हैं। यह अशुभ है। इसे रोका जाना चाहिए।
उपभोक्तावाद की संस्कृति — श्यामाचरण दुबे | विस्तृत अध्ययन
लेखक परिचय
श्यामाचरण दुबे (1922-1996) — प्रसिद्ध समाजशास्त्री। भारतीय समाज के गहन अध्ययनकर्ता। प्रमुख रचनाएँ: समय और संस्कृति, भारतीय ग्राम। पद्मभूषण से सम्मानित।
निबंध का विस्तृत विश्लेषण
लेखक ने उपभोक्तावाद को एक सांस्कृतिक संकट के रूप में प्रस्तुत किया है। मुख्य तर्क:
- विज्ञापन संस्कृति: विज्ञापन हमें बताते हैं कि हमें क्या चाहिए — हमारी इच्छाएँ कृत्रिम रूप से निर्मित होती हैं
- पश्चिमी अंधानुकरण: भारतीय समाज पश्चिम की नकल कर रहा है — खान-पान, पहनावा, जीवनशैली सब बदल रहा है
- सांस्कृतिक पहचान का संकट: हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं
- सादगी का महत्व: गांधी जी ने कहा — "पृथ्वी हर मनुष्य की ज़रूरत पूरी कर सकती है, पर लालच नहीं"
आदर्श उत्तर
उत्तर: उपभोक्तावाद ने भारतीय संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है। विज्ञापनों ने हमारी इच्छाओं को ज़रूरतों में बदल दिया है। हम अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं क्योंकि विज्ञापन कहता है कि हमें उनकी आवश्यकता है। पश्चिमी जीवनशैली का अंधानुकरण बढ़ा है — त्योहारों में भी बाज़ारवाद हावी है। भारतीय सादगी, संतोष और आत्मनियंत्रण के मूल्य कमज़ोर हो रहे हैं। गांधी जी के "सादा जीवन, उच्च विचार" का आदर्श भुलाया जा रहा है।